पंजाब में नशे के खिलाफ जारी जंग अब एक नई दिशा की ओर बढ़ रही है। मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान के ‘युद्ध नशेआं विरुद्ध’ अभियान के तहत सरकारी नशा मुक्ति एवं पुनर्वास केंद्रों में स्थापित पुस्तकालय युवाओं के लिए उम्मीद और बदलाव का नया माध्यम बनकर उभर रहे हैं। ये पुस्तकालय न केवल मरीजों के मानसिक स्वास्थ्य को मजबूत कर रहे हैं, बल्कि उन्हें सकारात्मक सोच और बेहतर जीवनशैली अपनाने के लिए भी प्रेरित कर रहे हैं। ‘लीडरशिप इन मेंटल हेल्थ प्रोग्राम’ के तहत युवाओं की भागीदारी से इन पुस्तकालयों की स्थापना, नवीनीकरण और रखरखाव किया जा रहा है। अब तक राज्य के 10 जिलों के सरकारी नशा मुक्ति केंद्रों में इस पहल को लागू किया जा चुका है, जबकि वर्ष 2026 के अंत तक 80 प्रतिशत से अधिक पुनर्वास केंद्रों तक इसे पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है। पुस्तकालयों में धार्मिक ग्रंथों, सिख इतिहास, साहित्य, कविता, जीवनी, पंजाबी संस्कृति और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी पुस्तकों का संग्रह उपलब्ध कराया गया है। विशेषज्ञों और काउंसलरों का कहना है कि किताबें मरीजों की एकाग्रता बढ़ाने, आत्मचिंतन को प्रोत्साहित करने और नशे की लत से उबरने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।
बठिंडा के सरकारी नशा मुक्ति एवं पुनर्वास केंद्र में पुस्तकें अब उपचार प्रक्रिया का अहम हिस्सा बन चुकी हैं। केंद्र के काउंसलर सोमा के अनुसार, पहले यहां कोई पुस्तकालय नहीं था, लेकिन डॉक्टरों की पहल के बाद इसकी शुरुआत की गई। अब मरीज खाली समय में किताबें पढ़ते हैं, आत्मकथाओं और कहानियों पर चर्चा करते हैं तथा पढ़ने के जरिए अपने मन को सकारात्मक दिशा देने का प्रयास करते हैं। उनके मुताबिक, किताबें मरीजों को जीवन और भविष्य को नए नजरिए से देखने के लिए प्रेरित करती हैं, जिससे वे अधिक शांत रहते हैं और उपचार प्रक्रिया में सक्रिय रूप से हिस्सा लेने लगते हैं।
वहीं, होशियारपुर के सरकारी नशा मुक्ति केंद्र की क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट संदीप कुमारी ने बताया कि वर्ष 2016 में घर-घर से किताबें एकत्र कर पुस्तकालय की शुरुआत की गई थी। उन्होंने कहा कि प्रेरणादायक साहित्य, जीवनियां और धार्मिक पुस्तकें मरीजों के बीच सबसे अधिक लोकप्रिय हैं। पुस्तकालय के माध्यम से कई मरीजों में एचआईवी/एड्स जैसी गंभीर बीमारियों के प्रति जागरूकता भी बढ़ी है। मरीजों का कहना है कि किताबों ने उन्हें जीवन को नए दृष्टिकोण से देखने का अवसर दिया है। बठिंडा केंद्र में उपचाराधीन नथाना गांव के परमिंदर सिंह (बदला हुआ नाम) ने बताया कि उन्हें सिख इतिहास और महान हस्तियों की जीवनियां पढ़ना पसंद है। वहीं, मलेरकोटला के अब्बासपुरा निवासी बलदेव सिंह का कहना है कि पढ़ने की आदत ने उन्हें दोबारा अपने लक्ष्य पर केंद्रित रहने में मदद की है।
काउंसलरों के अनुसार, शुरुआत में पढ़ाई में रुचि न दिखाने वाले मरीज भी धीरे-धीरे किताबों से जुड़ने लगते हैं। वे छोटी पुस्तकों से शुरुआत करते हैं और फिर एक-दूसरे के साथ किताबों का आदान-प्रदान करते हुए धर्म, इतिहास, कविता और प्रेरणादायक विषयों पर चर्चा करने लगते हैं। नशे की अंधेरी दुनिया से बाहर निकलने की कोशिश कर रहे युवाओं के लिए अब एक साधारण किताब सिर्फ पढ़ने का साधन नहीं, बल्कि नई जिंदगी की शुरुआत का जरिया बन रही है। ‘युद्ध नशेआं विरुद्ध’ अभियान के तहत पंजाब में किताबें नशे के खिलाफ लड़ाई का एक मजबूत हथियार बनकर सामने आई हैं।