फेफड़ों के कैंसर को लंबे समय से धूम्रपान से जुड़ी बीमारी माना जाता रहा है, लेकिन अब डॉक्टरों का कहना है कि यह खतरा उन लोगों पर भी मंडरा रहा है जिन्होंने कभी सिगरेट या तंबाकू का सेवन नहीं किया। बदलता पर्यावरण, बढ़ता प्रदूषण और कुछ आनुवंशिक कारण गैर-धूम्रपान करने वालों में भी इस बीमारी के मामलों को बढ़ा रहे हैं।
विशेषज्ञों के मुताबिक, भारत में ऐसे मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है जो धूम्रपान नहीं करते, फिर भी फेफड़ों के कैंसर से पीड़ित पाए जा रहे हैं। खास बात यह है कि अब यह बीमारी केवल बुजुर्गों तक सीमित नहीं है, बल्कि युवा और महिलाएं भी इसकी चपेट में आ रहे हैं।
डॉक्टरों का कहना है कि हवा में मौजूद PM2.5 कण, वाहनों और फैक्ट्रियों से निकलने वाला धुआं, सेकेंड हैंड स्मोक, रसोई के धुएं का लगातार संपर्क और खराब वेंटिलेशन फेफड़ों को धीरे-धीरे नुकसान पहुंचा सकते हैं। कुछ मामलों में आनुवंशिक बदलाव भी कैंसर की आशंका बढ़ा देते हैं।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि इस बीमारी की सबसे बड़ी चुनौती इसके शुरुआती लक्षणों को सामान्य समझकर नजरअंदाज करना है। लगातार रहने वाली खांसी, सांस लेने में परेशानी या सीने में दर्द जैसी समस्याओं को हल्के में नहीं लेना चाहिए। समय रहते जांच कराने से बीमारी का इलाज अधिक प्रभावी हो सकता है।

फेफड़ों के कैंसर के 6 अहम संकेत
- तीन सप्ताह से ज्यादा समय तक लगातार खांसी रहना।
- सांस फूलना या सांस लेते समय घरघराहट महसूस होना।
- खांसी के साथ खून या असामान्य रंग का बलगम आना।
- सीने, पीठ या कंधे में लगातार दर्द रहना।
- बार-बार फेफड़ों में संक्रमण होना और दवा का असर न होना।
- बिना वजह वजन कम होना, लगातार थकान या आवाज बैठ जाना।
बचाव के लिए अपनाएं ये उपाय
- प्रदूषण वाले क्षेत्रों में N95 मास्क पहनें।
- घर और कार्यस्थल पर साफ हवा व उचित वेंटिलेशन सुनिश्चित करें।
- अत्यधिक प्रदूषण के दौरान बाहर व्यायाम करने से बचें।
- लंबे समय तक रहने वाली खांसी या सांस की तकलीफ को नजरअंदाज न करें।
- किसी भी संदिग्ध लक्षण पर तुरंत विशेषज्ञ डॉक्टर से जांच कराएं।
नोट: यह खबर केवल सामान्य स्वास्थ्य जागरूकता के उद्देश्य से तैयार की गई है। किसी भी प्रकार की स्वास्थ्य समस्या होने पर चिकित्सक की सलाह अवश्य लें।