अमरनाथ यात्रा के दौरान इस बार बाबा बर्फानी के शिवलिंग का अपेक्षा से पहले पिघल जाना चर्चा का विषय बना हुआ है। यात्रा शुरू होने के कुछ ही दिनों में शिवलिंग का आकार काफी छोटा हो गया, जिससे श्रद्धालुओं के मन में कई सवाल उठने लगे। विशेषज्ञों का कहना है कि इसके पीछे प्राकृतिक और पर्यावरणीय कारण जिम्मेदार हो सकते हैं।
दरअसल, अमरनाथ गुफा में बनने वाला शिवलिंग किसी मानव निर्मित प्रक्रिया का हिस्सा नहीं है। गुफा की छत से लगातार टपकने वाली पानी की बूंदें कम तापमान में जमकर धीरे-धीरे बर्फ का स्तंभ बनाती हैं। यह पूरी प्रक्रिया गुफा के अंदर मौजूद तापमान, नमी और सर्दियों में हुई बर्फबारी पर निर्भर करती है।
इस वर्ष यात्रा के शुरुआती दिनों में ही बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचे, लेकिन बाद में आने वाले कई श्रद्धालुओं ने देखा कि शिवलिंग पहले की तुलना में काफी छोटा हो चुका है। इसके बाद यह सवाल उठने लगा कि आखिर इस बार प्राकृतिक हिम शिवलिंग इतनी जल्दी क्यों पिघल गया।
मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि पिछले कुछ वर्षों में हिमालयी क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन का असर तेजी से बढ़ा है। सर्दियों में कम बर्फबारी और गर्मियों में बढ़ते तापमान के कारण प्राकृतिक बर्फ लंबे समय तक टिक नहीं पा रही है। यही वजह है कि बर्फ से बनने वाली संरचनाएं पहले की तुलना में जल्दी पिघल रही हैं।
विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि यात्रा के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की मौजूदगी, कृत्रिम रोशनी और अन्य मानवीय गतिविधियां स्थानीय वातावरण को कुछ हद तक प्रभावित कर सकती हैं। हालांकि उनका कहना है कि सबसे बड़ा कारण वैश्विक स्तर पर बढ़ रहा तापमान और बदलता मौसम चक्र ही है।
पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार, अमरनाथ शिवलिंग का समय से पहले पिघलना हिमालयी क्षेत्रों में हो रहे जलवायु परिवर्तन का एक संकेत माना जा सकता है। उनका मानना है कि यदि पर्यावरण संरक्षण और ग्लोबल वॉर्मिंग पर प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में ऐसे बदलाव और अधिक देखने को मिल सकते हैं।